लेखक-सुनील वशिष्ठ, पत्रकार

कई दशकों तक पत्रकारिता को समाज की आंख और कान कहा जाता रहा, वह माध्यम जिसके जरिए लोग दुनिया को समझते हैं, विचार बनाते हैं और सत्ता से सवाल करते हैं। लेकिन अब यह भूमिका गहरे बदलाव से गुजर रही है। डिजिटल युग में जब हर व्यक्ति अपने फोन से समाचार बना और बांट सकता है, तब कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस क्रम को और भी जटिल बनाती हुई दिख रही है। यह केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं है; यह पत्रकारिता के मूलभूत अर्थों, उसकी जिम्मेदारियों और उसके अस्तित्व के केंद्र में स्थित भरोसे के ढांचे को पुनर्परिभाषित कर देता है।

आज एआई के पास इतनी क्षमता है कि वह कुछ ही क्षणों में लाखों सूचनाओं को छांटकर ऐसा लेख तैयार कर सकता है, जिसे पढ़कर पाठक को किसी अनुभवी पत्रकार की शैली का आभास हो सकता है। यह बात जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही चिंताजनक भी है। पत्रकारिता लंबे समय से तथ्यों की तह तक जाने, मानवीय संवेदना को समझने और घटनाओं के बीच छिपे संबंधों को उजागर करने की कला रही है। एआई इस कला की नकल तो कर सकता है, लेकिन उसका अनुभव मनुष्य जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि वह दर्द, भय, उल्लास, असहजता या असमानता को महसूस नहीं करता। फिर भी, उसका असर इतना व्यापक है कि पत्रकारिता उसकी उपस्थिति को अनदेखा नहीं कर सकती।

एआई की वजह से रिपोर्टिंग का स्वरूप बदल रहा है। डेटा-प्रधान पत्रकारिता में अब मशीनें उन पैटर्नों को पहचान लेती हैं जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में मनुष्य महीनों की मेहनत के बाद समझ पाता। किसी शहर की अपराध प्रवृत्ति का विश्लेषण हो या किसी चुनाव में सोशल मीडिया के प्रभाव का अध्ययन—एआई बहुत कम समय में जटिल जानकारियों के बीच छिपे संकेत खोज कर पेश कर सकता है। यह पत्रकारों के काम को अधिक सक्षम बनाता है, लेकिन इसके साथ यह भी चुनौती देता है कि मशीन द्वारा सुझाए गए निष्कर्ष कहीं मानव दृष्टि और जजमेंट को पीछे न धकेल दें।

एआई के कारण समाचार उत्पादन की गति भी अविश्वसनीय स्तर पर पहुंच गई है। डिजिटल मीडिया में कंटेंट की भूख इतनी तेज है कि पल दर पल नई सुर्खियों का दबाव बना रहता है। ऐसे में मशीनें एक आकर्षक समाधान बनकर सामने आती हैं। वे शीघ्रता से लेख, सारांश और विश्लेषण तैयार कर सकती हैं। लेकिन गति के साथ सबसे बड़ा संकट है गुणवत्ता और सत्यता का। जब जानकारी मशीन द्वारा तैयार की जाती है, तब उसमें किसी संदर्भ की गलत व्याख्या, स्रोत की कमजोर जांच या भावनात्मक असंतुलन का खतरा मौजूद रहता है। पत्रकारिता का सार यही रहा है कि वह सत्य को जल्दबाजी के आगे न झुका दे, जबकि एआई की दुनिया में यही सबसे आसान गलती बन सकती है।

पत्रकारिता में एआई का दूसरा बड़ा प्रभाव है खबरों के निजीकरण का। एल्गोरिथ्म अब हर पाठक की पसंद, नापसंद, विचारधारा और ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर खबरें सजाने लगे हैं। यह सुविधा सहज लगती है, लेकिन इसने समाज को छोटे-छोटे सूचना द्वीपों में बांटना शुरू कर दिया है जहां हर व्यक्ति केवल वही समाचार पढ़ता है जो उसकी सोच से मेल खाते हैं। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य हमेशा यह रहा है कि वह पाठक को उसकी सीमित दुनिया से बाहर निकालकर व्यापक वास्तविकता से परिचित करवाए। एआई आधारित निजीकरण इस उद्देश्य को धीरे-धीरे कमज़ोर कर देता है क्योंकि वह असहमति, विविधता और आलोचना जैसी पत्रकारिता की मूल चेतना को किनारे कर देता है।

इसके साथ ही एआई ने फेक न्यूज़ के खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले झूठी खबरें गढ़ना कठिन और समय लेने वाला काम था, लेकिन अब एआई आधारित टूल्स किसी भी फोटो को बदल सकते हैं, किसी भी आवाज़ की हूबहू नकल कर सकते हैं और किसी भी घटना की काल्पनिक कहानी ऐसे प्रस्तुत कर सकते हैं कि उसे सच से अलग पहचान पाना मुश्किल हो जाए। पत्रकारों पर अब यह ज़िम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है कि वे हर सूचना को कई स्तरों पर परखें, स्रोतों की जांच करें और डिजिटल विकृति के बीच सत्य को पहचानने की कला को और परिष्कृत करें। यह एक ऐसा युग बन चुका है जिसमें गलत सूचना का प्रसार बिजली की गति से होता है और पत्रकारिता का सबसे बड़ा हथियार है उसकी सावधानी, विवेक और पारदर्शिता।

एआई ने पत्रकारों के कौशल को भी पुनर्परिभाषित किया है। पुराने समय में एक रिपोर्टर को घटना स्थल पर पहुंच कर तथ्यों को दर्ज करना, स्रोतों से बातचीत करना और विश्लेषण तैयार करना ही सबसे आवश्यक माना जाता था। अब उसके सामने डेटा समझने, एल्गोरिथ्म की कार्यप्रणाली को जानने, मशीन द्वारा सुझाए गए निष्कर्षों को परखने और नई डिजिटल सत्यापन तकनीकों का उपयोग करने जैसे नए कौशल अनिवार्य हो गए हैं। एआई ने पत्रकारिता को अधिक तकनीकी बना दिया है, लेकिन साथ ही उसे अधिक संवेदनात्मक भी बना दिया है, क्योंकि मशीन की अंधी तर्कशीलता का संतुलन अब मानव मूल्य तय करेंगे।

एआई की उपस्थिति ने संपादकीय स्वतंत्रता पर भी नए सवाल खड़े किए हैं। जब समाचार संस्थान ट्रैफिक बढ़ाने के लिए एल्गोरिथ्म की मदद लेते हैं, तो यह खतरा पैदा हो जाता है कि पत्रकारिता धीरे-धीरे सूचना का व्यवसाय बनकर रह जाए। मशीनें यह तय करने लगें कि कौन सी खबरें ज्यादा क्लिक लाएंगी और उसी के आधार पर सामग्री तैयार होने लगे। ऐसे माहौल में वे खबरें, जिनकी सामाजिक जरूरत सबसे अधिक होती है, दब सकती हैं क्योंकि वे शायद एल्गोरिथ्म को आकर्षक न लगें। पत्रकारिता हमेशा से लाभ और जिम्मेदारी के बीच संतुलन का माध्यम रही है, और एआई इस संतुलन को अधिक पेचीदा बना रहा है।

इस पूरे परिवर्तन के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि पाठकों का भरोसा किस पर टिका रहेगा। क्या लोग यह जान पाएंगे कि वे जिस खबर को पढ़ रहे हैं, वह मशीन द्वारा बनाई गई है या किसी रिपोर्टर ने उसे अपने अनुभव, जांच और संवेदनशीलता के साथ लिखा है? पारदर्शिता पत्रकारिता की आत्मा होती है। यदि समाचार संस्थान यह स्पष्ट नहीं करेंगे कि वे एआई का उपयोग किस तरह करते हैं, तो धीरे-धीरे खबरों पर से विश्वास का ताना-बाना कमजोर होता चला जाएगा। पाठक को यह अधिकार है कि वह जानकारी प्राप्त करते समय उसके स्रोत और प्रक्रिया को समझ सके।

पत्रकारिता हमेशा समाज के बदलावों के साथ बदलती रही है। रेडियो आया तो लेखन बदला, टीवी आया तो प्रस्तुति बदली, इंटरनेट आया तो गति और पहुंच बढ़ी। आज एआई आया है और वह पत्रकारिता के मूल को चुनौती दे रहा है। यह परिवर्तन अनिवार्य है, लेकिन यह दिशा कौन तय करेगा—मशीनें या मनुष्य—यह सवाल अब पहले से कहीं अधिक अहम हो चुका है।